भारतीय सिनेमा के इतिहास में सस्पेंस और पारिवारिक थ्रिलर फिल्मों की जब भी बात होगी, विजय सालगांवकर और 2 अक्टूबर की कहानी को हमेशा याद रखा जाएगा। गांधी जयंती की छुट्टी पर सिनेमाघरों में रिलीज हुई अजय देवगन की फिल्म 'दृश्यम 3: द कन्क्लूजन' (Drishyam 3: The Conclusion) ने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी है। फिल्म ने पहले ही दिन कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए भारतीय बॉक्स ऑफिस पर 66.75 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया है।

दुनिया भर के आंकड़ों की बात करें तो पहले दिन का ग्रॉस कलेक्शन 95 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। यह अजय देवगन के तीन दशक लंबे करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग साबित हुई है। इससे पहले किसी भी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म ने भारत में पहले दिन इतनी भारी कमाई दर्ज नहीं की थी।

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बॉक्स ऑफिस आंकड़े: पहले दिन का पूरा विश्लेषण

ट्रेड विश्लेषकों के अनुसार, फिल्म को देश भर में करीब 4,800 से अधिक स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था। सुबह के पहले शो से ही दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, उत्तर प्रदेश, गुजरात और बिहार के सिनेमाघरों में 85 प्रतिशत से अधिक ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई।

  • भारत में कुल नेट कमाई (Day 1): 66.75 करोड़ रुपये
  • ओवरसीज (विदेशों से कमाई): लगभग 15.20 करोड़ रुपये
  • दुनिया भर में कुल ग्रॉस कलेक्शन: 95.10 करोड़ रुपये
  • अजय देवगन का व्यक्तिगत रिकॉर्ड: 'सिंघम अगेन' और 'दृश्यम 2' के पहले दिन के आंकड़ों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया।
कहानी का ताना-बाना: क्या इस बार पकड़ा जाएगा विजय सालगांवकर?

दृश्यम फ्रेंचाइजी की खासियत हमेशा से इसकी कहानी की कसावट और पुलिस बनाम एक आम पिता की बुद्धि की लड़ाई रही है। पहली दो फिल्मों में जहां विजय सालगांवकर (अजय देवगन) अपनी बेटी और परिवार को बचाने के लिए आईजी मीरा देशमुख (तब्बू) के जाल से बाल-बाल बच निकलता है, वहीं इस तीसरे और अंतिम भाग में कहानी उस अंतिम मोड़ पर पहुंचती है जहां अतीत का हर राज बाहर आने को बेताब है।

इस बार जांच की कमान सीबीआई के एक बेहद शातिर और बेरहम विशेष जांच अधिकारी (जयदीप अहलावत) के हाथों में है। जयदीप अहलावत का किरदार किसी कागजी नियम पर नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान और कमजोर नब्ज पकड़ने में माहिर है। फिल्म में अजय देवगन और जयदीप अहलावत के बीच का बौद्धिक टकराव (Mind Game) पर्दे पर देखने लायक है।

सरल उदाहरण से समझें दृश्यम का आकर्षण

दृश्यम की सफलता का रहस्य समझना बहुत सरल है। इसे शतरंज के उस खेल की तरह समझा जा सकता है जहां एक खिलाड़ी के पास केवल एक मोहरा बचा हो, लेकिन वह हर चाल ऐसी सोच-समझकर चलता है कि सामने वाले की पूरी सेना हैरान रह जाती है। दर्शक विजय सालगांवकर से इसलिए जुड़ते हैं क्योंकि वह कोई महामानव या सुपरहीरो नहीं है, बल्कि एक साधारण केबल ऑपरेटर पिता है जो अपने परिवार की सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है।

आम इंसान जब पर्दे पर कानून की विशाल मशीनरी के सामने एक आम आदमी को अपनी बुद्धि के बल पर खड़े होते देखता है, तो वह खुद को उस नायक की जगह महसूस करने लगता है। यही इस फिल्म की असली ताकत है।

कलाकारों का अभिनय: तब्बू, जयदीप अहलावत और प्रकाश राज का प्रभाव

अभिषेक पाठक के निर्देशन में बनी इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका अभिनय विभाग है:

  • अजय देवगन: विजय सालगांवकर के किरदार में अजय देवगन ने आंखों और चेहरे के भावों से जो खामोश तनाव दिखाया है, वह दर्शकों की सांसें थाम देता है।
  • जयदीप अहलावत: फिल्म में जांच अधिकारी के रूप में जयदीप अहलावत ने असाधारण काम किया है। उनकी तीखी नजरें और शांत अंदाज अजय देवगन के सामने एक बराबर की टक्कर पेश करते हैं।
  • तब्बू और श्रिया सरन: एक बेबस मां के दर्द और बदले की आग को तब्बू ने एक बार फिर पूरी संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। वहीं श्रिया सरन ने एक डरी हुई लेकिन समर्पित पत्नी का किरदार बखूबी निभाया है।
  • प्रकाश राज: वरिष्ठ अभिनेता प्रकाश राज की उपस्थिति कहानी में एक नया और अप्रत्याशित मोड़ लेकर आती है।
ओरिजिनल स्क्रिप्ट और सस्पेंस का अंत

दृश्यम के पहले दो भाग मलयालम फिल्मों के आधिकारिक रीमेक थे, लेकिन इस तीसरे भाग की पटकथा पूरी तरह से मौलिक (Original) लिखी गई है। फिल्म के आखिरी 30 मिनट में आने वाले अप्रत्याशित मोड़ (Twists) ऐसे हैं जिनकी सिनेमाहॉल में बैठा कोई भी दर्शक कल्पना नहीं कर सकता। क्लाइमेक्स में जब सारे धागे एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो पूरा थियेटर तालियों से गूंज उठता है।

स्वतंत्र समीक्षा और आगे की राह

लंबी छुट्टियों (गांधी जयंती और वीकेंड) के चलते यह तय माना जा रहा है कि 'दृश्यम 3' अपने पहले वीकेंड में ही 200 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लेगी। आज के दौर में जब बड़े बजट की फिल्में केवल भारी-भरकम एक्शन और वीएफएक्स पर निर्भर हो गई हैं, उस दौर में दृश्यम 3 यह साबित करती है कि अगर कहानी में दम हो और सस्पेंस मजबूत हो, तो दर्शक सिनेमाघरों की ओर खिंचे चले आते हैं।

यह फिल्म केवल एक मर्डर मिस्ट्री का समापन नहीं है, बल्कि यह एक परिवार के उस अटूट बंधन की कहानी है जो कानून, समय और परिस्थितियों के सबसे कठिन इम्तिहान में भी एक साथ खड़ा रहता है।