डिजिटल युग में पति-पत्नी के बीच होने वाले विवादों की शक्ल पूरी तरह बदल चुकी है। आज जब कोई वैवाहिक विवाद फैमिली कोर्ट या पुलिस थाने पहुंचता है, तो दोनों पक्षों की फाइलों में अदालती दलीलों से ज्यादा व्हाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट, कॉल रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया मैसेज भरे होते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सिर्फ मोबाइल फोन पर हुई बातचीत या व्हाट्सएप चैट के आधार पर किसी पर व्यभिचार (एडल्ट्री) का आरोप साबित किया जा सकता है? क्या पति इन चैट्स को दिखाकर पत्नी का गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) रुकवा सकता है?
इस जटिल और बेहद संवेदनशील विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक और विस्तृत कानूनी व्यवस्था दी है। हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश की खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा है कि पारिवारिक अदालतों (Family Courts) में डिजिटल साक्ष्य पेश तो किए जा सकते हैं, लेकिन सिर्फ सोशल मीडिया मैसेज किसी को चरित्रहीन या व्यभिचारी साबित करने के लिए काफी नहीं हैं। कानून की नजर में 'एडल्ट्री' साबित करने के लिए ठोस, निरंतर और अकाट्य प्रमाण की आवश्यकता होती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) की धारा 65B के तहत किसी भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जैसे कॉल रिकॉर्डिंग या कंप्यूटर प्रिंटआउट को अदालत में साबित करने के लिए एक तकनीकी सर्टिफिकेट लगाना अनिवार्य होता है। कई बार फैमिली कोर्ट इस तकनीकी आधार पर पतियों द्वारा पेश की गई व्हाट्सएप चैट या फोन रिकॉर्डिंग को खारिज कर देती थीं कि उनके साथ धारा 65B का सर्टिफिकेट नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस तकनीकी अड़चन को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट एक्ट (पारिवारिक न्यायालय अधिनियम) की धारा 14 पारिवारिक अदालतों को विशेष अधिकार देती है। इस धारा के अनुसार, फैमिली कोर्ट किसी भी ऐसे दस्तावेज, रिपोर्ट या डिजिटल सामग्री को रिकॉर्ड पर ले सकती है, जो मामले की सच्चाई तक पहुंचने और विवाद का सही निपटारा करने में सहायक हो, भले ही वह साक्ष्य अधिनियम के कड़े तकनीकी नियमों पर खरी न उतरती हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी पति को अपनी रक्षा में व्हाट्सएप चैट या कॉल रिकॉर्डिंग पेश करने के अधिकार से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास साइबर लैब का औपचारिक प्रमाण पत्र नहीं है। अदालत को उन चैट्स को देखना चाहिए और उस पर विचार करना चाहिए।
क्या सिर्फ चैट स्क्रीनशॉट से एडल्ट्री साबित हो सकती है?हाईकोर्ट ने यह तो माना कि चैट को सबूत के तौर पर अदालत में देखा जा सकता है, लेकिन इसके तुरंत बाद अदालत ने जो दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण फैसला दिया, वह वैवाहिक कानून का नया पैमाना बन गया है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा: "सिर्फ व्हाट्सएप चैट या सोशल मीडिया संदेशों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है (Living in Adultery)।"
अदालत ने 'व्यभिचार में रहने' (Living in Adultery) की कानूनी परिभाषा को समझाते हुए कहा कि कानून में इसके लिए एक स्पष्ट और कड़ा पैमाना है:
- लगातार और निरंतर संबंध: व्यभिचार का अर्थ किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लगातार, नियमित और शारीरिक रूप से अनैतिक संबंध में रहना है। किसी के साथ सामान्य बातचीत, दोस्ती या पेशेवर संपर्क को व्यभिचार नहीं कहा जा सकता।
- ठोस साक्ष्य की अनिवार्यता: महज किसी चैट में कुछ बातचीत या संदेशों के आदान-प्रदान से शारीरिक संबंधों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। जब तक साथ रहने (Cohabitation) या शारीरिक नजदीकी का कोई ठोस, प्रत्यक्ष या अकाट्य प्रमाण न हो, तब तक कानून व्यभिचार नहीं मानता।
- संदेह और सबूत में अंतर: कानून संदेह के आधार पर किसी महिला के चरित्र पर सवाल उठाने या उसका गुजारा भत्ता बंद करने की अनुमति नहीं देता। संदेह कितना भी गहरा हो, वह अदालत में सबूत की जगह नहीं ले सकता।
भारत में जब पति-पत्नी अलग होते हैं, तो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के तहत पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण (Maintenance) पाने का कानूनी अधिकार है। इस धारा का उप-खंड 4 कहता है कि यदि पत्नी व्यभिचार में रह रही हो, तो वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।
अक्सर देखा जाता है कि पति भरण-पोषण की देनदारी से बचने के लिए पत्नी के मोबाइल की पुरानी चैट्स या पुरुष मित्रों के साथ सामान्य बातचीत के स्क्रीनशॉट अदालत में पेश कर देते हैं और दावा करते हैं कि पत्नी एडल्ट्री में है, इसलिए उसे खर्चा न दिया जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने ऐसे मामलों में स्थिति पूरी तरह शीशे की तरह साफ कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि पति धारा 125(4) का लाभ उठाकर गुजारा भत्ता रोकने की मांग कर रहा है, तो जिम्मेदारी पूरी तरह पति पर है कि वह चैट से आगे बढ़कर ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण दे, जिससे यह सिद्ध हो कि पत्नी लगातार किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंधों में लिप्त है। केवल शक या अस्पष्ट चैट्स से पत्नी का आर्थिक अधिकार नहीं छीना जा सकता।
सरल उदाहरण से समझें यह कानूनी अंतरइसे एक रोज़मर्रा के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी दफ्तर में कोई कर्मचारी अपने किसी सहकर्मी को रोजाना फोन करता है या देर रात तक व्हाट्सएप पर मैसेज भेजता है। क्या सिर्फ इस आधार पर यह मान लिया जाएगा कि वे दोनों चोरी या किसी अपराध की साजिश कर रहे हैं? बिल्कुल नहीं। जब तक चोरी का कोई वास्तविक सामान या कृत्य न पकड़ा जाए, तब तक सिर्फ बातचीत अपराध का सबूत नहीं बनती।
ठीक इसी तरह, अदालत ने कहा कि फोन पर बात करना या मैसेज भेजना किसी भी रिश्ते में संदेह पैदा कर सकता है, लेकिन पारिवारिक अदालत में किसी पर व्यभिचार का कानूनी ठप्पा लगाने के लिए केवल बातचीत नहीं, बल्कि कृत्य का ठोस प्रमाण चाहिए।
डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता: स्क्रीनशॉट से छेड़छाड़ का खतराआजकल एआई (AI), फोटोशॉप और फेक चैट जनरेटर ऐप्स के जरिए किसी भी व्यक्ति के नाम से नकली व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट बनाना चंद मिनटों का काम है। किसी भी नंबर की प्रोफाइल पिक्चर बदलकर या फेक नंबर से मैसेज भेजकर ऐसा दर्शाया जा सकता है कि सामने वाला व्यक्ति आपत्तिजनक बातें कर रहा है।
हाईकोर्ट ने इस तकनीकी खतरे को भी रेखांकित किया। स्क्रीनशॉट को मूल इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं माना जाता, क्योंकि स्क्रीनशॉट को आसानी से काटा-छांटा (Crop) या एडिट किया जा सकता है। यदि किसी चैट को पुख्ता सबूत बनाना है, तो मूल फोन की फॉरेंसिक जांच, मोबाइल सेवा प्रदाता (Telecom Operator) से प्राप्त आधिकारिक कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और टावर लोकेशन जैसे तकनीकी प्रमाणों से उसका मिलान होना अनिवार्य है।
स्वतंत्र दृष्टिकोण: पारिवारिक विवाद, मर्यादा और कानून का संतुलनवैवाहिक विवादों में यह फैसला न्यायपालिका के संतुलन को दर्शाता है। एक तरफ जहां पतियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे अपनी बात रखने के लिए डिजिटल सबूत अदालत के सामने रख सकते हैं और अदालत उन्हें बिना सुने खारिज नहीं करेगी; वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के सम्मान और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा करते हुए यह सुनिश्चित किया गया है कि बिना पुख्ता बुनियाद के सिर्फ शक के आधार पर किसी पर लांछन न लगाया जाए।
परिवार समाज की सबसे बुनियादी और मजबूत इकाई है। जब रिश्ते टूटते हैं, तो दोनों पक्षों को अत्यधिक मानसिक और सामाजिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। ऐसे में अदालतों का यह दायित्व है कि वे तकनीकी पेचीदगियों में उलझे बिना न्याय करें, लेकिन साथ ही किसी भी पक्ष के चरित्र और गरिमा को हल्के में न लिया जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय आने वाले समय में देश भर की फैमिली कोर्ट्स के लिए एक मार्गदर्शक नजीर साबित होगा, जहां डिजिटल साक्ष्यों की परख अब और अधिक परिपक्वता, गहराई और निष्पक्षता के साथ की जाएगी।