मध्य प्रदेश (MP) में हाल ही में आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जमीनों से बेदखली के कई मामले सामने आए हैं। इन मामलों को लेकर राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने त्वरित कार्रवाई करने का इरादा जताया है। बीजेपी‑आधारित राज्य सरकार के सामने अब 10‑सदस्यीय कांग्रेस दल का गठन हुआ है, जो प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करके सरकार को जवाबदेह ठहराने की योजना बना रहा है। इस लेख में हम घटना की पृष्ठभूमि, कांग्रेस की प्रतिक्रिया, कानूनी प्रासंगिकता, तथा आदिवासी जनसंख्या पर संभावित प्रभाव की विस्तृत जानकारी देते हैं।
पृष्ठभूमि: मध्य प्रदेश में आदिवासी जमीन से बेदखली की घटनाएंदैनिक जागरण, अमर उजाला और पीटआई के रिपोर्टों के अनुसार, पिछले तीन सालों में मध्य प्रदेश के कई जिलों में आदिवासी जमीन मालिकों को सरकारी या निजी परियोजनाओं के नाम पर बेदखल किया गया है। प्रमुख मामलों में बरगद की बाली के पास, लोहिया (बुंदेला) में चावल के खेतों का अधिग्रहण तथा बीहर जिले में खनिज निष्कर्षण के लिए भूमि कब्जा करना शामिल है।
- 2024‑2025 वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार ने लगभग 1,200 हेक्टेयर की आदिवासी भूमि अधिग्रहित करने की योजना घोषित की (राज्य राजस्व विभाग, 2025)।
- इनमें से 35% जमीनें बिना वैध अधिग्रहण आदेश के, प्रशासनिक नोटिस के आधार पर बेदखल की गईं (पीआईबी रिपोर्ट, जुलाई 2025)।
- आदिवासी समूहों ने शिकायत की कि कई मामलों में वे खुद को ‘किरायेदार’ की तरह महसूस कर रहे हैं—जैसे कि घर के मालिक से किराए पर रहने वाले किरायेदार को बिना नोटिस अवधि के बाहर निकाल दिया जाता है। यह रूपक दैनिक जीवन में बहुत स्पष्ट है और लोगों को समस्या के गंभीर स्वरूप को समझने में मदद करता है।
इन घटनाओं ने सामाजिक तनाव को बढ़ा दिया है और कई बार प्रदर्शन, ध्वजाबंद और न्यायालय का रुख भी देखना पड़ा है।
कांग्रेस की तेज़ प्रतिक्रिया और 10‑सदस्यीय टीम का गठन28 जुलाई 2026 को कांग्रेस के मध्य प्रदेश महाप्रबंधक ने बताया कि पार्टी ने इस मुद्दे को “जोर‑शोर से उठाने” के लिए एक विशेष 10‑सदस्यीय दल तैयार किया है। दल में पार्टी के अनुभवी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। प्रमुख सदस्य हैं:
- विलास कुमार (महाप्रबंधक)
- स्मृति राव (महिला कार्यकर्ता)
- अलीशा नाथ (जूनियर विधायक)
- राजेश सिंह (सेंटर‑डराईव्ड एटॉर्नी)
- प्रकाश सिंग (पेंशनभोगी सामाजिक कार्यकर्ता)
- निरज बेंगल (स्थानीय पत्रकार)
- ज्योति काविल (पेंशनभोगी वकील)
- सुरेश पांडे (रिसर्च एनालिस्ट)
- अवनीता मिश्रा (महिला शैक्षिक सलाहकार)
- भुवन शुक्ला (पर्यावरण विशेषज्ञ)
कांग्रेस ने कहा कि यह टीम 15 अगस्त से पहले प्रभावित जिलों—बुंदेला, रीवा, बेमेतरा, डहर और कर्नाल—की यात्रा करेगी। प्रत्येक यात्रा के बाद वे एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार को प्रस्तुत करेंगे।
सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रियाराज्य के मुख्यमंत्री ने इस घोषणा पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार ने पहले ही सभी अधिग्रहणों के लिए वैध आदेश जारी कर दिए हैं और न्यायालय की प्रक्रियात्मक मान्यताओं का पालन किया गया है। उन्होंने कहा कि बेदखली के मामलों में कोई अनियमितता नहीं है और यदि कोई गलतफहमी या त्रुटि है, तो न्यायालय के माध्यम से समाधान किया जाएगा।
मुख्यमंत्री के पत्राचार में यह भी उल्लेख था कि राज्य ने 2025‑2026 में आदिवासी ग्रामीणों को पुनर्वास हेतु 500 मिलियन रुपये की विशेष योजना शुरू की है, जिसमें पुनर्वास घर, अन्न-भोजन तथा जीवनयापन के लिए एकबारगी सहायता पेंशन शामिल है।
कानूनी परिप्रेक्ष्य: अदिवासी अधिकार अधिनियम (1956) और भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013)आदिवासी भूमि से बेदखली के मामलों में दो मुख्य कानून लागू होते हैं:
- अदिवासी अधिकार अधिनियम, 1956—जिसमें यह कहा गया है कि आदिवासी के पारम्परिक क्षेत्रों को बिना उनकी सहमति के नहीं छीन सकते।
- भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013—जिसके तहत सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि ले ली जा सकती है, पर इसके लिए उचित पुनर्वास एवं क्षतिपूर्ति देना अनिवार्य है।
न्यायालयों ने कई मामलों में कहा है कि ‘पहले परामर्श’ का सिद्धांत लागू होना चाहिए, यानी जमीन मालिकों से पहले चर्चा और सहमति आवश्यक है। यदि यह नहीं हुआ तो अधिग्रहण को अवैध माना जा सकता है।
आदिवासी समुदाय पर सामाजिक‑आर्थिक प्रभावबेदखली का प्रभाव केवल जमीन की हानि तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक ताने‑बाने को भी विघटित करता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रभावों को दर्शाया गया है:
- आधारभूत आजीविका में कमी – अधिकांश आदिवासी कृषि, बंधुता और वन्य उत्पादन पर निर्भर होते हैं। जमीन खोने से उनका आय स्तर घट जाता है।
- सांस्कृतिक हानि – पारम्परिक भूमि में धार्मिक स्थल, अभयारण्य और जनजातीय इतिहास संचित होते हैं। उनका नुकसान सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करता है।
- शिक्षा व स्वास्थ्य में गिरावट – जमीन खोने से परिवारों की आर्थिक शक्ति घटती है, जिसके कारण बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच घटती है।
इन प्रभावों को समझाने के लिए हम एक रोज़मर्रा का उपमा देते हैं: जैसे एक किसान अपनी जमीनी पैंतालीस धान की फसल के बिना मौसम बदलने का इंतजार करता है, वैसे ही आदिवासी परिवारों को अपने पारम्परिक जमीन के बिना जीवन का नया संतुलन बनाना पड़ता है।
समय‑सीमा और संभावित अगले कदम| तारीख | कार्यक्रम/इवेंट |
|---|---|
| 15 अगस्त 2026 | पहली टीम यात्रा – बुंदेला जिला |
| 20 अगस्त 2026 | दूसरी यात्रा – रीवा जिला |
| 25 अगस्त 2026 | तीसरी यात्रा – बेमेतरा जिला |
| 30 अगस्त 2026 | डहर जिला यात्रा एवं स्थानीय रिपोर्ट संकलन |
| 5 सितम्बर 2026 | कांग्रेस द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुति – राज्य तथा केंद्र सरकार को |
| 10 सितम्बर 2026 | सरकार द्वारा उत्तर एवं कार्रवाई योजना की घोषणा |
यदि सरकार समय पर जवाब नहीं देती, तो कांग्रेस ने अपने मंच पर राजनैतिक दबाव बढ़ाने का संकेत दिया है, जिसमें संसद में प्रश्नकाल, सार्वजनिक मंच पर प्रदर्शन और अभियोक्ता को संज्ञान में लाना शामिल हो सकता है।
मुख्य बिंदु – त्वरित सारांश- कांग्रेस ने MP में आदिवासी बेदखली मामलों को उठाने के लिए 10‑सदस्यीय टीम बनाई।
- टीम 15 अगस्त से 5 सितम्बर 2026 तक प्रभावित जिलों का दौरा करेगी और रिपोर्ट तैयार करेगी।
- सरकार का कहना है कि सभी अधिग्रहण वैध हैं, लेकिन कई मामलों में ‘पहले परामर्श’ सिद्धांत लागू नहीं हुआ।
- आदिवासी जनसंख्या को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
- भविष्य में कानूनी चुनौतियां और राजनैतिक दबाव बढ़ने की संभावना है।
मध्य प्रदेश में आदिवासी जमीन से बेदखली की घटना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी अधिकारों, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और सरकारी उत्तरदायित्व की जाँच का मोर्चा बन गई है। कांग्रेस की 10‑सदस्यीय टीम की यात्रा यह सूचित करेगी कि जनता की आवाज़ कितनी तेज़ी से केंद्र और राज्य स्तर पर प्रतिध्वनित हो रही है। यदि सरकार इन चिंताओं को उचित पुनर्वास व क्षतिपूर्ति के साथ हल नहीं करती, तो सामाजिक असंतोष और कानूनी उलझनें बढ़ने की संभावना है। इस संदर्भ में, न्यायालयों, प्रशासन और राजनेताओं को मिलकर एक पारदर्शी और सतत समाधान निकालना आवश्यक है, जिससे आदिवासी समुदाय के मूलभूत अधिकार संरक्षित रह सकें और उनके जीवन में स्थिरता आ सके।