मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों राजस्व महकमे और सरकार के बीच अभूतपूर्व गतिरोध बना हुआ है। प्रदेश के इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब सरकार ने कड़ा प्रशासनिक डंडा चलाते हुए परिवीक्षा अवधि (प्रोबेशन पीरियड) में चल रहे 27 पटवारियों की सेवाएं सीधे समाप्त कर दीं, दर्जनों वरिष्ठ पटवारियों को निलंबित कर दिया और हजारों को कारण बताओ नोटिस थमा दिए। इसके बावजूद मैदानी स्तर पर काम करने वाले लगभग 19 हजार पटवारी झुकने को तैयार नहीं हैं। वे स्वामित्व योजना के तहत होने वाली मुफ्त रजिस्ट्रियों के काम का पूर्ण बहिष्कार किए बैठे हैं। आम जनता तहसील दफ्तरों के चक्कर काट रही है, सीमांकन, नामांतरण, जाति और आय प्रमाण पत्र जैसे जरूरी काम ठप पड़े हैं, लेकिन सवाल उठता है कि आखिर एक साधारण से दस्तावेज पर 'एक दस्तखत' करने से ऐसा क्या हो जाएगा जिसे लेकर पटवारियों ने अपनी सरकारी नौकरी तक दांव पर लगा दी है? वहीं दूसरी तरफ, प्रदेश की मोहन यादव सरकार इस मामले में इतनी सख्त मुद्रा में क्यों दिखाई दे रही है?

क्या है 'एक दस्तखत' का पूरा पेंच: निष्पादक की भूमिका का डर

इस पूरे विवाद के केंद्र में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना' (SVAMITVA Scheme) है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण आबादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनकी रिहायशी जमीन और मकान का कानूनी मालिकाना हक (प्रॉपर्टी कार्ड व रजिस्ट्री) देना है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस योजना के तहत गांवों में लगभग 50 लाख संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री कराने का बड़ा अभियान शुरू किया है। इस अभियान में सरकार ने तहसीलदारों और पटवारियों को जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन विवाद तब भड़का जब पंजीयन विभाग के प्रारूप में पटवारी को 'निष्पादक' (Executant यानी दस्तावेज का निष्पादन करने वाला या विक्रेता पक्ष) के रूप में दस्तखत करने का निर्देश दिया गया।

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इसे समझने के लिए एक घरेलू और व्यावहारिक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए, आपके मोहल्ले में किसी पुराने मकान के बंटवारे को लेकर भाइयों में अनबन है। अब यदि कोई तीसरा व्यक्ति आपसे कहे कि आप रजिस्ट्री कार्यालय चलकर उस मकान की सेल डीड पर 'मालिक या मुख्य हस्तांतरणकर्ता' के रूप में अपने हस्ताक्षर कर दीजिए ताकि सामने वाले को मालिकाना कागज मिल जाए। आप निश्चित रूप से पीछे हटेंगे, क्योंकि आप उस संपत्ति के असली मालिक नहीं हैं। यदि कल को किसी भाई ने अदालत में फर्जीवाड़े का मुकदमा दायर किया, तो पुलिस सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाले को ही कटघरे में खड़ा करेगी। ठीक यही स्थिति आज मध्य प्रदेश के पटवारियों के सामने खड़ी हो गई है।

पटवारियों का स्पष्ट तर्क है कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता (MPLRC) के तहत पटवारी केवल एक राजस्व अभिलेख संधारक (रिकॉर्ड कीपर) होता है। वह जमीन का मालिक या उसे किसी को हस्तांतरित करने वाला विधिक प्राधिकारी नहीं है। यदि वह रजिस्ट्री डीड पर निष्पादक के तौर पर हस्ताक्षर करता है, तो कानून की नजर में वह उस अंतरण का प्रत्यक्ष जिम्मेदार बन जाता है। कल यदि आबादी भूमि के किसी टुकड़े पर दो पक्षों में खूनी संघर्ष हुआ या सिविल कोर्ट में मुकदमा चला, तो पटवारी सीधे तौर पर पक्षकार और भारतीय न्याय संहिता (पुराने आईपीसी की धारा 420 आदि) के तहत आरोपी बन सकता है।

जमीनी हकीकत: ड्रोन सर्वे और गांव के विवादों का टकराव

स्वामित्व योजना के तहत गांवों में आबादी भूमि का नक्शा ड्रोन कैमरों के जरिए तैयार किया गया है। तकनीक के स्तर पर यह काम बेहद आधुनिक दिखता है, लेकिन मैदानी स्तर पर भारतीय गांवों की सामाजिक संरचना बेहद जटिल है। कई दशकों से आबादी भूमि का कोई विस्तृत खसरा या रकबा तय नहीं था। पीढ़ियों से लोग आपसी सहमति या कब्जे के आधार पर रह रहे हैं।

मैदानी स्तर पर आने वाली तीन प्रमुख व्यावहारिक अड़चनें:

  • एक पट्टे पर कई वारिस: सरकारी रिकॉर्ड में किसी बुजुर्ग के नाम पर दर्ज पट्टे पर आज उनके तीन या चार बेटों और पोतों के परिवार अलग-अलग कमरों में रह रहे हैं। ड्रोन ने छत का एक घेरा नाप दिया, लेकिन अंदरूनी कब्जे और रास्ते को लेकर पारिवारिक विवाद कायम हैं। ऐसे में किसी एक के नाम रजिस्ट्री पर दस्तखत करना विवाद को न्योता देना है।
  • कब्जा किसी का, पुराना नाम किसी और का: गांव के कई हिस्सों में मूल पट्टेदार पलायन कर चुके हैं और उस जमीन पर वर्षों से किसी अन्य ग्रामीण का आधिपत्य है। राजस्व नियमों के अनुसार बिना विधिवत न्यायिक प्रक्रिया के कब्जाधारक को पूर्ण वैधानिक स्वत्व अंतरित नहीं किया जा सकता।
  • रास्ते और निस्तार भूमि का पेंच: कई जगह मकानों के आगे की गली या सार्वजनिक निस्तार की जमीन को भी मकान के दायरे में शामिल कर लिया गया है। पड़ोसी पक्ष तुरंत आपत्ति दर्ज कराता है कि पटवारी ने सार्वजनिक रास्ते को किसी निजी व्यक्ति के नाम दर्ज करा दिया।

पटवारियों का कहना है कि जब तक विवादों का निपटारा तहसीलदार की अदालत में विधिवत सुनवाई करके नहीं होता, तब तक वे आनन-फानन में किसी भी कागजात पर हस्ताक्षर करके जीवनभर अदालती मुकदमों और विभागीय जांचों का जोखिम नहीं उठा सकते।

सरकार का इतना कड़ा रुख क्यों: प्रतिष्ठा, समयसीमा और नीतिगत दबाव

अब सिक्के का दूसरा पहलू देखना भी जरूरी है कि मध्य प्रदेश शासन ने 27 पटवारियों को बर्खास्त करने जैसा कठोर कदम क्यों उठाया? इसके पीछे प्रशासनिक, विकासात्मक और राजनीतिक कारण मौजूद हैं।

प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना केंद्र सरकार का एक राष्ट्रीय फलक का फ्लैगशिप कार्यक्रम है। मध्य प्रदेश ने शुरुआती दौर में ड्रोन मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने में देश के अग्रणी राज्यों में स्थान बनाया था। राज्य सरकार का लक्ष्य था कि निर्धारित समयसीमा के भीतर प्रदेश के सभी 55 जिलों में लाखों ग्रामीणों को प्रॉपर्टी कार्ड और नि:शुल्क रजिस्टर्ड दस्तावेज सौंप दिए जाएं। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था में जमीन का मालिकाना हक एक बड़ा गेम-चेंजर माना जाता है, क्योंकि वैध रजिस्ट्री मिलने के बाद ग्रामीण उस संपत्ति को बैंक में बंधक रखकर कृषि ऋण, व्यवसाय ऋण या बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन ले सकते हैं।

जब शासन ने पूरे तंत्र को इस अभियान में झोंक दिया, तब पटवारियों द्वारा दस्तावेजों पर दस्तखत करने से इनकार करने को प्रशासन ने 'सरकारी आदेशों की खुली नाफरमानी' और 'नागरिक कल्याणकारी योजना में जानबूझकर अड़ंगा' माना। वरिष्ठ अधिकारियों का दृष्टिकोण यह था कि यदि प्रोबेशन पर चल रहे नए कर्मचारियों को इस प्रकार अभियान का बहिष्कार करने की छूट दी गई, तो भविष्य में कोई भी प्रशासनिक सुधार लागू करना असंभव हो जाएगा। इसी प्रशासनिक अनुशासन को स्थापित करने के लिए शासन ने सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत तत्काल प्रभाव से 27 परिवीक्षाधीन पटवारियों की सेवाएं समाप्त कर दीं और वरिष्ठों को निलंबित करने के आदेश जारी किए।

आंकड़ों और असर में समझें: आम जनता पर दोहरी मार

शासन और कर्मचारियों के बीच जारी इस टकराव की सबसे भारी कीमत आम ग्रामीण और किसान चुका रहे हैं। मध्य प्रदेश के अधिकांश तहसील परिसरों में सन्नाटा पसरा हुआ है या फिर केवल फरियादियों की कतारें दिखाई दे रही हैं।

  • 27 प्रोबेशनर पटवारी बर्खास्त: सागर, दमोह, रीवा, सतना और छिंदवाड़ा सहित विभिन्न जिलों में सेवा समाप्ति के कड़े आदेश पारित किए गए।
  • 100 से अधिक निलंबन और नोटिस: विभिन्न जिलों के कलेक्टरों द्वारा काम पर न लौटने वाले पटवारियों को विभागीय जांच और निलंबन के आदेश थमाए गए।
  • 55 जिलों में राजस्व सेवाएं ठप: किसानों की खतौनी नकल, सीमांकन के प्रकरण, नामांतरण और बंटवारे की हजारों फाइलें तहसीलों में धूल फांक रही हैं।
  • विद्यार्थी और युवा परेशान: प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश प्रक्रियाओं के लिए जरूरी आय, जाति और मूल निवासी प्रमाण पत्र की जांच रिपोर्ट पटवारियों के हस्ताक्षर न होने से अटकी पड़ी हैं।
  • रबी सीजन की गिरदावरी प्रभावित: वर्तमान समय में फसलों की बोवनी और गिरदावरी का काम भी पटवारियों की हड़ताल के चलते प्रभावित होने की कगार पर पहुंच गया है।
पटवारी संघ की प्रमुख मांगें: विधिक सुरक्षा की दरकार

मध्य प्रदेश पटवारी संघ का कहना है कि वे सरकार की किसी जनकल्याणकारी योजना के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे केवल अपनी विधिक सुरक्षा (Legal Immunity) सुनिश्चित कराना चाहते हैं। संघ ने शासन के सामने कुछ प्रमुख बिंदु रखे हैं:

  1. निष्पादक की जिम्मेदारी से मुक्ति: स्वामित्व योजना के दस्तावेजों में पटवारी को निष्पादक न बनाया जाए। इसके स्थान पर सक्षम राजस्व अधिकारी जैसे तहसीलदार, नायब तहसीलदार या अधिकृत नोडल अधिकारी को निष्पादक बनाया जाए, जैसा कि अन्य सरकारी पट्टा वितरण में होता है।
  2. न्यायिक संरक्षण का लिखित प्रावधान: यदि योजना के क्रियान्वयन के दौरान किसी सीमांकन या त्रुटि के कारण भविष्य में कोई दीवानी या फौजदारी विवाद पैदा होता है, तो फील्ड में काम करने वाले पटवारी को शासकीय कार्य के संपादन के तहत कानूनी संरक्षण मिले।
  3. बर्खास्तगी और निलंबन की वापसी: आंदोलन के दौरान जिन 27 पटवारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है और जिन अधिकारियों को निलंबित किया गया है, उनके आदेश बिना किसी शर्त के तत्काल निरस्त किए जाएं।
समाधान की राह और आगे का परिदृश्य

मध्य प्रदेश शासन और पटवारी संघ के बीच गतिरोध समाप्त करने के लिए उच्च स्तर पर वार्ता के कई दौर शुरू हुए हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय और राजस्व मंत्री के स्तर पर भी इस बात पर मंथन किया जा रहा है कि कैसे योजना की विधिक संरचना में संशोधन किया जाए ताकि कर्मचारियों का भय दूर हो सके और योजना का काम भी न रुके। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शासन पंजीयन नियमों में संशोधन कर ग्राम पंचायत के सचिव या तहसीलदार को शासकीय पक्ष की ओर से अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता बना सकता है, जबकि पटवारी की भूमिका केवल स्थलीय सत्यापन और प्रतिवेदन प्रस्तुत करने तक सीमित रखी जा सकती है।

प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी योजना की सफलता कागजी आदेशों से ज्यादा मैदानी अमले के विश्वास पर टिकी होती है। मध्य प्रदेश का यह गतिरोध यह सबक देता है कि जब बड़े नीतिगत बदलाव जमीनी स्तर पर उतारे जाएं, तो उसके संभावित कानूनी और व्यावहारिक खतरों का पूर्व आकलन आवश्यक है। जब तक शासन अपने कर्मचारियों को विधिक संरक्षण का ठोस भरोसा नहीं दिलाता और पटवारी जनहित को प्राथमिकता देते हुए काम पर नहीं लौटते, तब तक गांव के अंतिम छोर पर खड़ा आम नागरिक अपने बुनियादी अधिकारों के लिए भटकने को विवश रहेगा।