मध्य प्रदेश के दो महत्वपूर्ण फ़ूड सेफ़्टी लैबों—जबलपुर में स्थित लॅबोरटरी (JFO) और भोपाल में स्थित रिफ़्रेशमेंट एंड फ़ूड टेस्टिंग सेंटर (RFTC)—पर सर्टिफ़िकेशन के लंबित इंतजार और सैंपल प्रोसेसिंग में गहरी जाम का सामना कर रहे हैं। यह बाधा न केवल प्रदेश के खाद्य उद्योग पर असर डाल रही है, बल्कि उपभोक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भी बड़ी चुनौती पेश कर रही है।
पृष्ठभूमि: फ़ूड सेफ़्टी लैबों का महत्वभारत में फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (FSSAI) द्वारा सौंपे गए मानक परीक्षण लैबें, खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, स्वच्छता और सुरक्षित उपभोग सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। प्रत्येक राज्य को कम से कम एक मान्यता प्राप्त लैब स्थापित करनी होती है, जो उत्पादों को नियामक मानकों के अनुसार जांचे। मध्य प्रदेश में यह दो लैबों के माध्यम से पूरा होता है, जो राज्य के बड़े औद्योगिक क्लस्टर—जबलपुर का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और भोपाल का रिफ़्रेशमेंट उत्पादन केंद्र—से जुड़ी हैं।
ETV भारत के 30 अक्टूबर 2026 के रिपोर्ट के अनुसार, जबलपुर लैब को लगभग दो साल से सर्टिफ़िकेशन बोर्ड (ISO/IEC 17025) की मंज़ूरी का इंतजार जारी है। दूसरी ओर, भोपाल लैब को वर्तमान में 6,400 से अधिक खाद्य सैंपल्स की जांच के लिए कतार का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ अधिकांश सैंपल्स 30 दिनों से अधिक समय तक अप्रक्रियित रह गए हैं।
जबलपुर लैब के सर्टिफ़िकेशन में देरी के कारण
- FSSAI की आधिकारिक रिपोर्ट (दिवस 12 अक्टूबर 2026) के अनुसार, लैब को तकनीकी मानकों के अनुपालन में कई बिंदु सुधारने की आवश्यकता बताई गई। इनमें उपकरण कैलिब्रेशन, सैंपल ट्रैकिंग सिस्टम और मानवीय संसाधन प्रशिक्षण शामिल हैं।
- राज्य सरकार के खाद्य एवं औषधि विभाग ने 15 अक्टूबर को जारी एक आदेश में कहा कि संसाधन आवंटन में असमानता और बजट प्रतिबंधों ने सुधार कार्य को अंजाम देना कठिन बना दिया।
- केंद्रीय स्तर पर, ISO ऑडिटर की उपलब्धता में कमी ने भी प्रक्रिया में धीरज बढ़ाया। पिछले वर्ष केवल 10 ऑडिटर ने राष्ट्रीय स्तर पर 30+ लैबों के ऑडिट पूरा किए।
भोपाल लैब में सैंपल्स की बाढ़ के प्रभाव
- भोजन सुरक्षा के विशेषज्ञ डॉ. अजय सिंह (पीडब्ल्यूएससी, भोपाल) ने बताया कि 4,200 सैंपल्स का परीक्षण न होने पर संभावित विषाक्त पदार्थों, जलीय सूक्ष्मजीवों और अवैध एडिटिव्स का पता नहीं चल पा रहा है, जिससे बाजार में जोखिम बढ़ रहा है।
- आँकड़े (MP फ़ूड सर्टिफ़िकेशन डेस्क, 10 अक्टूबर 2026) के अनुसार, पिछली तिमाही में सैंपल इनकम में 45% की वार्षिक वृद्धि देखी गई है, मुख्य कारणों में नई रिफ़्रेशमेंट प्लांट्स का उद्घाटन और उपभोक्ता जागरूकता में वृद्धि शामिल हैं।
- राज्य पब्लिक हेल्थ विभाग ने 20 अक्टूबर को कहा कि देर से रिपोर्टिंग के कारण स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों को संभावित एरियोपोर्ट-जनित रोगों की रोकथाम में बाधा उत्पन्न हो रही है।
मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने इस मुद्दे को उठाते हुए शुक्रवार, 12 अक्टूबर को एक प्रेस ब्रीफ़िंग किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "फ़ूड सेफ़्टी को कोई समझौता नहीं सौंपा जा सकता। हम तुरंत आवश्यक संसाधन प्रदान करेंगे और केंद्र सरकार के साथ समन्वय कर सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया को तेज़ करेंगे।"
मुख्य कदम जिनकी घोषणा की गई:
- जबलपुर लैब को अतिरिक्त ₹1.5 करोड़ के ग्रांट के माध्यम से उपकरण अपग्रेडेशन और स्टाफ प्रशिक्षण का प्रावधान।
- भोपाल लैब में 12 नवीनतम हाई-थ्रूपुट PCR और माइक्रोबायोलॉजी उपकरण स्थापित करने के लिये तत्काल अनुबंध।
- सैंपल ट्रैकिंग के लिए एक डिजिटल पोर्टल लागू किया जाएगा, जिससे हर सैंपल की स्थिति वास्तविक‑समय में देखी जा सकेगी।
- पर्याप्त ऑडिटर उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर अतिरिक्त ISO/IEC 17025 मानदंडों के प्रशिक्षकों को नियुक्त करने का प्रस्ताव।
10 अक्टूबर को ग्वालियर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने एक सार्वजनिक याचिका दर्ज की, जिसमें उपभोक्ताओं ने फ़ूड सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया में देरी के कारण बाजार में अनाज, मिठाइयाँ और ताज़ा उत्पादों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने आदेश जारी किया कि अगले 30 दिनों में राज्य सरकार को एक विस्तृत कार्य‑योजना प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें सैंपल परीक्षण का समय‑सीमा, लैब सर्टिफ़िकेशन प्रगति और जनता को सूचित करने के तरीके शामिल हों।
आर्थिक प्रभाव और उद्योग का दृष्टिकोणउद्योग संघों ने भी इस स्थिति पर अपने विचार रखे हैं। मध्य प्रदेश फ़ूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन (MPFPA) के अध्यक्ष श्रीमती रचना वर्मा ने कहा, "यदि लैबों की क्षमता नहीं बढ़ती, तो छोटे और मध्यम उद्यम (SME) को निर्यात और घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने में बाधा आएगी। इससे संभावित राजस्व हानि ₹500 करोड़ तक पहुँच सकती है।"
साथ ही, कुछ व्यवसायियों ने वैकल्पिक निजी लैबों को इस्तेमाल करने का विकल्प उठाया है, जिससे लागत में 15‑20% की वृद्धि होने की संभावना है। यह अतिरिक्त बोझ अंततः अंतिम उत्पाद की कीमत में परिलक्षित हो सकता है, जिसका असर सामान्य उपभोक्ता पर पड़ेगा।
जनता की प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य जोखिमभोपाल के स्थानीय निवासी और उपभोक्ता समूहों ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। "हम रोज़मर्रा के खाने में भरोसा नहीं कर पा रहे हैं," एक फेसबुक पोस्ट में लिखा गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि देर से परीक्षण से संभावित रोगजनक (जैसे सैल्मोनेला, ई.कोलाई) का प्रसार बढ़ सकता है, विशेषकर गर्मियों के महीनों में।
भविष्य के लिए सिफ़ारिशेंविज्ञान एवं नीति विशेषज्ञों के एक समूह ने संक्षेप में निम्नलिखित सिफ़ारिशें प्रस्तुत की हैं:
- लैबों की ऑडिटिंग प्रक्रिया को त्वरित करने के लिये एक विशेषीकृत केंद्र बनाना, जहाँ हर तिमाही में सभी राज्य लैबों का सामूहिक मूल्यांकन हो।
- डिज़िटलीकरण के माध्यम से सैंपल ट्रैकिंग, रिपोर्टिंग और सार्वजनिक सूचना के लिए एक ओपन‑डेटा मंच स्थापित करना।
- पर्याप्त बजट आवंटन के साथ मानक उपकरणों के निरंतर रख‑रखाव और कैलिब्रेशन को अनिवार्य बनाना।
- उत्पादकों के लिए फूड सेफ़्टी प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित करना, जिससे पहले से ही मुद्दे पहचान कर सुधारा जा सके।
- सार्वजनिक चेतना अभियानों के जरिए उपभोक्ताओं को सैंपल टेस्टिंग की प्रक्रिया और रीयल‑टाइम परिणामों की जानकारी देना।
फ़ूड सेफ़्टी लैबों पर सर्टिफ़िकेशन और सैंपल प्रोसेसिंग की देरी, मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है। जबकि सरकार और नियामक एजेंसियां त्वरित कदम उठा रही हैं, वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब तकनीकी सुधार, बजट समर्थन, और सार्वजनिक जागरूकता एक साथ मिलकर कार्य करें। इस दिशा में जारी प्रयास ही उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन की गारंटी देंगे और प्रदेश की फ़ूड इंडस्ट्री को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में सहायक सिद्ध होंगे।