हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, जब छींक (Sneeze) आती है तो हमारी दोनों पलकें अपने आप झटके से बंद हो जाती हैं। बचपन में कई लोगों ने यह मिथक भी सुना होगा कि यदि छींकते समय आंखें खुली रखी जाएं, तो आंखों की पुतलियां (Eyeballs) बाहर निकल सकती हैं। लेकिन आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी और एनाटॉमी इस बारे में क्या कहती है?
1. 160 किमी/घंटा की गति से बाहर निकलता तूफान
छींक हमारे श्वसन तंत्र (Respiratory System) का एक बेहद शक्तिशाली रक्षात्मक तंत्र (Defense Mechanism) है। जब नाक की संवेदनशील श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane) में कोई धूलकण, परागकण (Pollen), वायरस या एलर्जी पैदा करने वाला तत्व प्रवेश करता है, तो नाक की ट्राइजेमिनल नर्व (Trigeminal Nerve) मस्तिष्क के निचले हिस्से—मेडुला ऑबलोंगाटा (Medulla Oblongata) में मौजूद 'स्नीज सेंटर' को चेतावनी संकेत भेजती है।
मेडुला एक सेकंड के दसवें हिस्से में छाती, डायाफ्राम, गले और चेहरे की दर्जनों मांसपेशियों को एक साथ सिकुड़ने का आदेश देता है। फेफड़ों से हवा लगभग 150 से 160 किलोमीटर प्रति घंटे की विस्फोटक गति से बाहर निकलती है ताकि अवांछित कण को बाहर फेंका जा सके।
2. नसों का साझा सिग्नल नेटवर्क (Shared Cranial Wiring)
आंखें बंद होने का कारण कोई यांत्रिक दबाव नहीं, बल्कि मस्तिष्क की वायरिंग है। मस्तिष्क जब छींकने के लिए मोटर सिग्नल्स भेजता है, तो चेहरे की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली सातवीं क्रेनियल नर्व (Facial Nerve) भी उसी सिग्नल से उत्तेजित हो जाती है। यह नर्व सीधे हमारी पलकों को बंद करने वाली 'ऑर्बिक्युलरिस ओकुलाई' (Orbicularis Oculi) मांसपेशी को भी बंद होने का रिफ्लेक्स दे देती है।
3. क्या छींकते समय आंखें बाहर आ सकती हैं?
नहीं, यह पूरी तरह से एक काल्पनिक मिथक है। आंखों की पुतलियों को छह मजबूत एक्स्ट्राओकुलर मांसपेशियों और ऑप्टिक नर्व ने सॉकेट के भीतर मजबूती से जकड़ा होता है। छींकने से आंखें बंद होना शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षात्मक उपाय है ताकि नाक और मुंह से तेज गति से बाहर निकलने वाले कीटाणु और छींटे आंखों में न चले जाएं।