उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से सरगर्मियां तेज हो गई हैं। राजनीतिक पार्टियां जमीन पर संगठन मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं प्रशासनिक स्तर पर भी समय-सारिणी को लेकर गुणा-भाग शुरू हो चुका है। हाल ही में माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) द्वारा जारी किए गए परीक्षा कार्यक्रम के बाद यह मजबूत कयास लगाया जा रहा है कि प्रदेश में 18वीं विधानसभा के गठन के लिए मतदान 25 फरवरी के बाद शुरू हो सकता है। छात्र-छात्राओं की पढ़ाई, शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी और मतदान केंद्रों के रूप में विद्यालयों के उपयोग के जटिल संतुलन ने चुनावी तारीखों की इस संभावित रूपरेखा को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों लग रहे हैं कयास?उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं का जो प्रस्तावित कार्यक्रम तैयार किया है, उसके अनुसार परीक्षाएं 5 फरवरी से शुरू होकर 24 फरवरी के बीच संपन्न कराई जानी हैं। बोर्ड परीक्षाओं की यह समय-सारिणी सामान्य वर्षों की तुलना में थोड़ी पहले रखी गई है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि परीक्षा कार्यक्रम को फरवरी के तीसरे सप्ताह में समेटने के पीछे का सबसे बड़ा कारण आगामी विधानसभा चुनावों के लिए प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह मुक्त करना है।
जब तक बोर्ड परीक्षाएं चल रही होती हैं, तब तक न तो मतदान केंद्र बनाए जा सकते हैं और न ही शिक्षकों को चुनावी प्रशिक्षण व मतदान ड्यूटी पर पूरी क्षमता के साथ तैनात किया जा सकता है। ऐसे में 24 फरवरी को परीक्षाएं समाप्त होते ही प्रशासन के पास मतदान कराने का स्पष्ट मार्ग खुल जाता है। यही कारण है कि विश्लेषक 25 फरवरी के बाद मतदान के प्रथम चरण की शुरुआत होने की प्रबल संभावना जता रहे हैं।
मान लीजिए आपके घर में एक ही बड़ा सामुदायिक हॉल या मुख्य बैठक है। उसी महीने आपके बच्चे की वार्षिक अंतिम परीक्षा भी है और उसी परिसर में परिवार के किसी बड़े मांगलिक उत्सव का आयोजन भी होना है। स्वाभाविक रूप से, आप कभी भी परीक्षा के दिन ही संगीत या दावत का बड़ा कार्यक्रम नहीं रखेंगे, क्योंकि भीड़-भाड़ और शोर में बच्चा परीक्षा नहीं दे पाएगा और आयोजन भी अव्यवस्थित हो जाएगा। आप पहले परीक्षा शांतिपूर्वक समाप्त होने देंगे और उसके अगले ही दिन से उत्सव की शुरुआत करेंगे। ठीक यही स्थिति राज्य में स्कूल भवनों और शिक्षकों की होती है। स्कूल पहले परीक्षा केंद्र बनते हैं और उनके निबटते ही वे मतदान केंद्र में तब्दील हो जाते हैं।
भारत में लोकतांत्रिक चुनाव की पूरी प्रक्रिया काफी हद तक सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के बुनियादी ढांचे पर टिकी होती है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहां 403 विधानसभा सीटें हैं और लगभग 15 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, वहां चुनाव कराना एक विशालकाय प्रशासनिक कार्य है।
- मतदान केंद्र और बूथ: प्रदेश के 90 प्रतिशत से अधिक पोलिंग बूथ प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में बनाए जाते हैं। जब तक इन भवनों में छात्र परीक्षा दे रहे हों, तब तक वहां केंद्रीय अर्धसैनिक बलों का ठहराव या ईवीएम-वीवीपैट की व्यवस्था संभव नहीं होती।
- मतदान कर्मियों की भूमिका: चुनाव में पीठासीन अधिकारी (प्रिजाइडिंग ऑफिसर) और मतदान अधिकारी के रूप में सबसे बड़ी संख्या बेसिक व माध्यमिक शिक्षकों की होती है। यदि शिक्षक परीक्षा में कक्ष निरीक्षक की ड्यूटी कर रहे होंगे, तो उन्हें मतदान ड्यूटी पर नहीं लगाया जा सकता।
- सुरक्षा बलों की तैनाती: बोर्ड परीक्षा और विधानसभा चुनाव दोनों ही संवेदनशील प्रक्रियाएं हैं। पुलिस बल और होमगार्ड्स को एक साथ दोनों मोर्चों पर पूरी क्षमता से तैनात करना कानून-व्यवस्था के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
इन तीनों प्राथमिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शासन स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाता है कि परीक्षा और चुनाव के बीच टकराव की स्थिति न बने।
इतिहास क्या कहता है? 2012, 2017 और 2022 के चुनाव का पैटर्नयदि हम उत्तर प्रदेश के पिछले तीन विधानसभा चुनावों के इतिहास पर नजर डालें, तो तारीखों का यह गणित और भी स्पष्ट हो जाता है:
1. विधानसभा चुनाव 2012
वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में सात चरणों में मतदान संपन्न कराया गया था। उस समय चुनाव आयोग ने मतदान की शुरुआत फरवरी के पहले सप्ताह में की थी और अंतिम चरण मार्च के पहले सप्ताह तक चला था। उस दौरान बोर्ड परीक्षाओं को मार्च के महीने में स्थानांतरित किया गया था।
2. विधानसभा चुनाव 2017
वर्ष 2017 में 17वीं विधानसभा के लिए चुनाव 11 फरवरी से शुरू होकर 8 मार्च तक सात चरणों में हुए थे। उस समय भी चुनाव आयोग ने पहले चुनावी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी थी और यूपी बोर्ड की परीक्षाएं चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद 16 मार्च 2017 से शुरू कराई गई थीं।
3. विधानसभा चुनाव 2022
वर्ष 2022 में कोरोना महामारी की तीसरी लहर के साए के बीच चुनाव आयोग ने 10 फरवरी से 7 मार्च तक सात चरणों में मतदान कराया था। नतीजे 10 मार्च को आए थे। इस वर्ष भी बोर्ड परीक्षाओं को चुनाव के बाद यानी 24 मार्च से 12 अप्रैल 2022 के बीच आयोजित किया गया था।
इस बार का बदलाव यह है कि बोर्ड परीक्षाओं को चुनाव के बाद ले जाने के बजाय, उन्हें फरवरी के पहले तीन हफ्तों में ही पूरा करा लिया जा रहा है, ताकि मार्च और अप्रैल का समय पूरी तरह चुनावी प्रक्रिया और नई सरकार के गठन के लिए खाली रहे।
संवैधानिक बाध्यता और चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्रयह समझना बेहद जरूरी है कि विधानसभा चुनाव की औपचारिक तारीखों की घोषणा का विशेषाधिकार केवल और केवल भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के पास है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर प्रदेश की मौजूदा 18वीं विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में समाप्त हो रहा है। संवैधानिक नियमों के अनुसार, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। चुनाव आयोग आमतौर पर कार्यकाल समाप्त होने से दो से तीन महीने पहले चुनावी प्रक्रिया संपन्न करा लेता है, ताकि सरकार गठन के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
जैसे ही चुनाव आयोग आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तारीखों का ऐलान करता है, पूरे राज्य में आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू हो जाती है। इसके लागू होते ही सरकार किसी भी नई नीति, शिलान्यास या लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा नहीं कर सकती। यदि चुनाव 25 फरवरी के बाद शुरू होने हैं, तो आचार संहिता की घोषणा जनवरी के पहले या दूसरे पखवाड़े में संभावित मानी जा सकती है।
उत्तर प्रदेश का भौगोलिक विस्तार और जनसंख्या का घनत्व इतना अधिक है कि यहां एक या दो चरणों में चुनाव कराना सुरक्षा बलों के दृष्टिकोण से संभव नहीं होता। पिछले तीन चुनावों की भांति इस बार भी 7 से 8 चरणों में मतदान कराए जाने की संभावना है।
- प्रथम व द्वितीय चरण (पश्चिमी उत्तर प्रदेश): 25 फरवरी से 5 मार्च के मध्य। पश्चिमी यूपी के संवेदनशील जिलों में अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती के साथ शुरुआत हो सकती है।
- तृतीय व चतुर्थ चरण (मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड): 7 मार्च से 15 मार्च के मध्य। अवध क्षेत्र और बुंदेलखंड के जिलों में मतदान का आयोजन।
- पंचम व छठा चरण (तराई और पूर्वांचल के शुरुआती जिले): 17 मार्च से 24 मार्च के मध्य।
- अंतिम चरण (वाराणसी, गोरखपुर और अंतिम छोर का पूर्वांचल): मार्च के अंतिम सप्ताह तक।
- मतगणना व परिणाम: अप्रैल के प्रथम सप्ताह में मतगणना पूरी कर नई सरकार के गठन की अधिसूचना जारी की जा सकती है।
संभावित तारीखों के इस संकेत ने राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों—भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस—की रणनीतियों को गति दे दी है।
सत्तापक्ष की रणनीति
सत्ताधारी दल के लिए 25 फरवरी की संभावित समय-सीमा का अर्थ यह है कि उनके पास विकास परियोजनाओं के लोकार्पण, शिलान्यास और प्रशासनिक स्वीकृतियों के लिए सीमित समय शेष है। आचार संहिता लागू होने से पहले सरकार जनहित से जुड़ी योजनाओं को धरातल पर उतारने और प्रचार तंत्र को चरम पर पहुंचाने का प्रयास करेगी।
विपक्ष की घेराबंदी
विपक्षी दलों के लिए यह समय अपने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और टिकट वितरण की प्राथमिक सूची तैयार करने का है। यदि चुनाव फरवरी के अंतिम सप्ताह में शुरू होते हैं, तो जनवरी के अंत तक प्रत्याशियों के नामों की घोषणा अनिवार्य हो जाएगी। विपक्ष कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, किसान कल्याण और महंगाई जैसे मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अपनी यात्राओं और रैलियों की समय-सारिणी को इसी अनुसार ढाल रहा है।
छात्रों और आम नागरिकों के लिए इसके क्या मायने हैं?इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षाओं में कोई अनिश्चितता नहीं रहेगी। जब परीक्षाएं चुनाव से टकराती हैं, तो छात्रों में तारीखें टलने को लेकर असमंजस रहता है। इस बार 24 फरवरी तक परीक्षाएं पूरी होने से छात्र अपनी तैयारी पर निर्बाध रूप से ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
वहीं आम नागरिकों और किसानों के लिए, मार्च का महीना रबी फसलों की कटाई और मौसम के बदलाव का समय होता है। यदि चुनाव मार्च के अंत तक सुव्यवस्थित रूप से निबट जाते हैं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के कामकाज पर न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा।
निष्कर्ष: अंतिम फैसला चुनाव आयोग के हाथ मेंसंक्षेप में कहें तो, यूपी बोर्ड द्वारा 5 से 24 फरवरी के बीच परीक्षा संपन्न कराने का निर्णय एक स्पष्ट संकेत देता है कि प्रशासनिक तंत्र फरवरी के अंतिम सप्ताह से चुनावी महासमर के लिए कमर कस रहा है। हालांकि, अंतिम तिथियों, चरणों की संख्या और विस्तृत कार्यक्रम का फैसला भारत निर्वाचन आयोग ही दिल्ली स्थित मुख्यालय से आधिकारिक प्रेस वार्ता के जरिए करेगा। तब तक, यह संभावित गणित न केवल राजनीतिक दलों बल्कि आम जनता और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी कार्ययोजना तय करने का मुख्य आधार बना रहेगा।